हुसैन जैसा शहीद ए आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है/Hussain Jaisa Shahid e Azam Jahan Mein Koi Hua Nahin Hai
ह़ुसैन जैसा शहीदे आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है छुरी के नीचे गला है लेकिन किसी से कोई गिला नहीं है ह़ुसैन जैसा शहीदे आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है अदू थे जब सर पे तेग़ तोले ह़ुसैन सजदे में जाके बोले मदीने वालों गवाह रहना नमाज़ मेरी क़ज़ा नहीं है ह़ुसैन जैसा शहीदे आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है हुसैन फरमाए साथियों से अदा करो पुर-जलाल सजदे है तेग़ो खंजर, तबर का साया कहां हमारा ख़ुदा नहीं है ह़ुसैन जैसा शहीद ए आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है पुकारे अब्बास ऐ सकीना मैं पानी लाऊंगा ख़ूब पीना कटे हैं बाज़ू छिदा है सीना अभी मेरा सर कटा नहीं है ह़ुसैन जैसा शहीदे आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है ग़रीब उम्मत की बेकसी पर ह़ुसैन का सर कटा है लेकिन यज़ीद जैसे शक़ी के आगे ह़ुसैन का सर झुका नहीं है ह़ुसैन जैसा शहीद ए आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है यज़ीद दुनिया में लाखों आए और सितम बन के ज़ुल्म ढाए चराग़े तौहीद फिर भी सादिक़ जला है लेकिन बुझा नहीं है ह़ुसैन जैसा शहीदे आज़म जहां में कोई हुआ नहीं है छुरी के नीचे गला है लेकिन किसी से कोई गिला नहीं है शायर: सादिक़ रज़ा